खुली आंखों से इक ख्वाब सा देखा है, हां ख्वाब ही तो है
इन्सान, इन्सानियत से भरपूर,
मेरे अफ़कार (writings) मुहब्बत में चूर;
शब उसकी याद में गवाई हुई,
रौशनाई (ink) सुर्ख रुख्सार में नहायी हुई;
सहर (morning) उसके दीदों (eyes) में ट्मट्माई हुई,
दोपहर अफ़्सुर्दा (intoxicated) गेसूओं (tresses) में बिताई हुई;
सर-ए-शाम उन लबों की मय के हवाले,
जो बिगड़ी मेरी ज़िन्दगी को बना ले;
खुली आंखों से इक ख्वाब सा देखा है, हां ख्वाब ही तो है
हैरान हूं, उसके ज़बीं (forehead) पे सलवटें क्यों है,
यक़्लख्त (all of a sudden) रौशनाई ख़ून से सनी क्यों है;
क्या इन्सानी फ़ितरत फ़िर रंग बद्लने लगी है,
क्या इसकी रग़ों में अब नफ़रत दौड़्ने लगी है;
ये कौन सरकश (rebellion) हुजूम (crowd) को हांके जा रहा है,
ताबे-निशाते-बज़्म (happy and prosper society) को ठोकर से उडा रहा है
रोंद दो इसके इब्तदाई (about to begin) न-पाक़ मन्सूबे (plans), मज़ाहिब (religions) से उपर उठो
ख़ुदायाने-दीं (so called authorities of religion) को सिखलाओ एक सबक, जेहाद से उपर उठो
खुली आंखों से इक ख्वाब सा देखा है, हां ख्वाब ही तो है
--------------------- - Chander "Maun'