Friday, October 30, 2009

ऐ अमृत साहिर न छक सकेया - एक प्रेम कहानी



अमृता प्रीतम और साहिर की प्रेम कहानी के कई अफ़साने आप सभी ने सुने होंगे | ये अफसाना जुदा न सही, पर तफसील और सदाक़त से भरपूर है | रिश्ते की नज़ाक़त और बे-साख्तःगी का बहुत ध्यान रखने की पूरी कोशिश करूंगा |

अफ़साने की इब्तेदा जल्द से जल्द करने की कोशिश करूंगा | इस मज़मून का तसव्वुर हाल ही में शिमला के एक सरकारी हॉस्पिटल में अपने वालिद साहब की खैर ख्याली के दौरान हुआ | कियोंकि में १२ से १४ घंटे हॉस्पिटल में ही बिताया करता था, ये वक़्त किताबें पढ़ने के लिए बहुत मुनासिब था | आदतन साहिर साहब की ज़िन्दगी से वाबस्तः हर किताब और मकालाह पढ़ने से अच्छा और क्या हो सकता था |

इश्क का ताल्लुक, तकरीबन हर एक रंग में मेरी ज़ाती ज़िन्दगी से बहुत गहरा रहा है, इसलिए शायद इस प्रेम कहानी के साथ में इन्साफ कर सकूंगा | अपनी गैर-हाजिरी का हरज़ाना इस दीवाली के तोहफे की शक्ल में अता करने की आ सभी से इजाज़त चाहता हूँ | मेरी ये दीवाली सरकारी हॉस्पिटल और साहिर की प्रेम कहानी के नाम |

इस इश्क के फ़साने की इबारत-ए-आराई करने से पेश्तर, ये समझ लेना निहायती लाज़िम है के साहिर की नफ्सियाती हालत उनकी हस्ती के हर मोढ़ पे किस क़दर रंग बदल रही थी | तल्खी-ए-ज़ीस्त ने बचपन से जवानी तक साहिर का साथ नहीं छोड़ा | सही मानों में ये रंज-ओ-ग़म ही था जो साहिर का साथ निभाता चला गया और साहिर हर फिक्र को धुएं में उडाता चला गया |

साहिर बुनियादी तौर पे एक romantic शायर थे, जिसका इश्क कभी परवान न चढ़ सका | यही वजह थी की उनकी शायरी दर्द-ए-इश्क के अहसासात से भरपूर है | साहिर की शायरी में इश्क के हर रंग का अहसास शामिल है जो दिल की गहराईयों को छु जाता है | ये इश्क इब्तेदाई कमसिनी से सराबोर होकर जवानी के जुनूँ को सर-आमद करता हुआ आजिज़ की गिरफ्त तक जाता जान पढ़ता है |

शुरूआती मुफलिसी, वालिद से क़शीदः ताल्लुकात, वाल्देइन का जुदा होना, इन्तेहाई गैर-यकसानियत भरा मोआश्रह; सभी का साहिर की शायरी और इश्क से ताल्लुक है | साहिर का पहला प्यार, उनके करीबी दोस्त फैज़-उल-हसन के मुताबिक एक लड़की प्रेम चौधरी था, जिसका इन्तेकाल बे-वक़्त TB की वजह से जवानी में ही हो गया | आज़ुर्दः साहिर ने इस वाक़िये पर एक नज़्म 'मरघट' लिखी |

ये करीबन १९३९ का साल था और अभी इस हादसे को हुए ज्यादा वक़्त नहीं गुज़रा था, इसी बीच साहिर एक और बार इश्क में गिरफ्तार हो गए | ये मोआमला पहले से ज्यादा संगीन था, और लड़की थी 'ऐशर कौर' - एक सिख, जो ख़ूबसूरत, गुल-बदन, मूअनस, लताफ़त से लबालब थी | साहिर बतौर शायर अपना सिक्का जमा चुके थे और college के हर समागम में बढ़-चढ़ के हिस्सा लेते थे | साहिर की ये वाराफ्तःगी, परस्तिश में तब्दील होते जा रही थी | गर्मियों की छुट्टियों से पहले, जब ऐशर अपने गाँव जाने वाली थी, दोनों ने एक शाम college में तन्हाई में मिलने का इरादा किया | ये तो यकीनी तौर पे कहना मुश्किल है के, उन दोनों के दरमयान क्या हो गुज़रा (पढ़ने वाले इन्फिरादी तौर पे खुद तसव्वुर कर लें), बहरहाल, college के चौकीदार ने दोनों की शिकायत Principal से कर दी | जिसका अंजाम ये हुआ के, दोनों को college से निकाल दिया गया | साहिर के college से निकले जाने की एक और कहानी भी है, जिसके मुताबिक साहिर पर गाँव में जा कर किसानों को ज़मींदारों के खिलाफ भड़काने का इलज़ाम था | किसान-मजदूर तहरीक के चलते हिसाब के पर्चे में २ साल फेल भी हुए | कुछ लोगों का मानना है कि लड़की के दौलतमंद बाप को माली तौर पे फटेहाल साहिर से बेटी की ये मोहब्बत रास नहीं आई और college से साहिर को निकालने में अपनी दौलत की ताक़त का इस्तेमाल किया | बहरहाल, college से निकाले जाने के बाद दोनों मुख्तसर से वक़्त के लिए अलैहदः हो गए और एक बार फिर ख़तों और नादिर मुलाक़ातों के ज़रिये अपनी मोहब्बत को रफ्ता-रफ्ता आगे बढ़ाने लगे |

यूँ अचानक तेरी आवाज़ कहीं से आई
जैसे पर्वत का जिग़र चीर के झरना फूटे
या ज़मीनों की मोहब्बत में तड़प कर नागाह
आसमानों से कोई शोख़ सितारा टूटे

तू मेरे पास न थी, फिर भी सहर होने तक
तेरा हर सांस मेरे जिस्म को छुकर गुज़रा
क़तरा-क़तरा तेरे दीदार की शबनम टपकी
लम्हा-लम्हा तेरी खुशबू से मुअत्तर गुज़रा ||

ये तकरीबन १९४३ का वाकिया है, जब साहिर लुधियाना से लाहौर अपनी क़िताब 'तल्खियां' शये कराने के इरादे से आये हुए थे | इधर लुधियाने में ऐशर कौर ने अपने वालिद की ख्वाईश के खिलाफ़ बगावत कर दी और साहिर से मिलने लाहौर चली आई | दोनों ने एक रात साथ गुज़ारी और सुबह होते ही किसी गुमनाम वजह से बम्बई चली आई | शायद इन हालात में वालिद के पास वापिस जाना उन्हें नावाजिब लगा हो | खैर, बम्बई आने के बाद उन्हें कोई पुराना करीबी मिल गया, जिस से ऐशर ने जल्द ही निकाह कर लिया |

"बिछड़ गया हर साथी दे कर, पल दो पल का साथ
किसको फुर्सत है जो थामे दीवानों का हाथ
हमको अपना साया तक, अक्सर बेजार मिला
हमने तो जब कलियाँ मांगीं, काँटों का हार मिला!"

साहिर के इश्क की ये दूसरी नाक़ामी थी | न-खुशगवार हालात, मुफलिसी, न-पज़ीराई वगेहरह ने साहिर के दिल पर गहरा ज़ख्म छोड़ा | साहिर देखने में इतने ख़ूबसूरत न रहे हों, लेकिन उनका अपने आप को बदसूरत मानना नफ्सियाती तौर पे और भी बुरा था, जो उन्हें आने वाली ज़िन्दगी में उनके मुकाबिल और मुश्किलें पैदा करने वाला था |

अब तक साहिर बम्बई आकर फिल्मो में गीत लिखना शुरू कर चुके थे और खासा नाम भी कमा चुके थे | इन्ही दिनों की एक और शक्सियत मोहतरमा सुधा मल्होत्रा जो की मौसिकी में एक नामवर, तालीम-याफ्तः फनकार थी, से रब्तः रखता फ़साना सर-सरी तौर पे सुना रहा हूँ | साहिर की नाक़ाम इश्किया कोशिशों में से ये भी एक दिलचस्प इत्तेफाक है | सुधा की पैदाइश दिल्ली में ३० नवम्बर १९३० को हुयी | इनका बचपन लाहौर, भोपाल और फिरोजपुर में गुज़रा | आगरा university से संगीत में डिग्री करने के बाद, उस्ताद अब्दुल रहमान खान और पंडित लक्ष्मन प्रसाद जयपुर-वाले की सरपरस्ती में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम हासिल की | सुधा के संगीत के हुनर और बेखुद जिस्मानी खूबसूरती को पहले पहल उस ज़माने के कामयाब फ़िल्मी मौसीक़ार ग़ुलाम हैदर साहब ने फिरोजपुर के Red Cross के जलसे में पहचाना | AIR में बखूबी बतौर child artist काम करने के बाद ११ साल की उम्र से सुधा ने फिल्मो में गाना शुरू कर दिया |

इन्हें गाने का पहला मौक़ा बतौर पार्श्व गायक फिल्म आरज़ू में अनिल बिस्वास साहब के मातहत मिला | बहुत सी फिल्मों में कामयाब नगमे गाने के बावजूद सुधा दूसरी मशहूर हस्तियों मसलन लता, आशा वगैरह की फिरस्त में शामिल न हो सकी | फिल्मों में काम भी बाकाएदा हासिल नहीं हो रहा था, ऐसे में साहिर फ़रिश्ते की मानिंद सुधा की ज़िन्दगी में आये | साहिर ने नायारण दत्ता जो की उनके अच्छे दोस्तों में शुमार होते थे, से सुधा की सिफारिश की | फिर क्या था सुधा साहिर के एक से बड़कर एक ख़ूबसूरत नगमों को आवाज़ देती रही और साहिर अपनी शायरी के ज़रिये सुधा में एक महबूब ढूंढता रहा |

तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको
मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है
मेरे दिल की मेरे जज़्बात की कीमत क्या है
उलझे उलझे से खयालात की कीमत क्या है
मैंने क्यों प्यार किया तुमसे, क्यों प्यार किया
इन परेशान सवालात की कीमत क्या है
तुम जो यह भी न बताओ तो ये हक है तुमको
मेरी बात...

ज़िन्दगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है
ज़ुल्फ़ रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है
भूख़ और प्यास की मारी इस दुनिया में
इश्क ही एक हकीकत नहीं कुछ और भी है
तुम अगर आँख चुराओ तो ये हक है तुमको
मैंने तुमसे ही नहीं सबसे मोहब्बत की है

तुमको दुनिया के ग़म-ओ-दर्द से फुर्सत न सही
सबसे उल्फत सही मुझसे ही मोहब्बत न सही
मैं तुम्हारी हूँ यही मेरे लिए क्या कम है
तुम मेरे हो के रहो,ये मेरी किस्मत न सही
और भी दिल को जलाओ तो ये हक है तुमको
मेरी बात...

इस मशहूर नगमे से वाबस्ता एक किस्सा भी है | जिस दिन ये नगमा record होने वाला था, अचानक दत्ता साहब बीमार हो गए और song picturisation मुल्तवी करना मुमकिन नहीं था | इस मौक़े पर सुधा नें नगमे की बंदिश खुद बनाने की पेशकश की, जिससे मुत्तास्सिर हुए बगैर साहिर भी न रह सके | ये नगमा बहुत ही मशहूर हुआ और साहिर के दिल की अनकही रुदाद बन के रह गया | अपनी खोटी किस्मत के मुताबिक साहिर एक बार फिर इश्क में नाकामयाब हो चुके थे | कुछ लोगों का मानना है के सुधा ने साहिर से नजदीकियां फिल्मों में काम हासिल करने के लिए बढाई और आखिरकार साहिर की मोहब्बत को रास्ता दिखा दिया | कहा जाता है, इसी नाकामी के चलते जब साहिर ने नयी-२ शादी-शुदा सुधा को एक पार्टी में देखा तो ये खुबसूरत नज़्म लिखी:

चलो इक बार फिर से,
अजनबी बन जाएं हम दोनो
चलो इक बार फिर से ...

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की
न तुम मेरी तरफ़ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये मेरी बातों से
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्म-कश का राज़ नज़रों से
चलो इक बार फिर से ...

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माझी की
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं
चलो इक बार फिर से ...

तार्रुफ़ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
चलो इक बार फिर से ...

साहिर का सबसे मशहूर दस्तावेज़ इश्किया फ़साना अमृता प्रीतम से मुत्तालिक है | ये फ़साना दरअसल इसी मौज़ू के आस-पास रहता, मगर इन दोनों शक्सियात की नफ्सियाती हालत जाने बगैर इसे आगे बढाना जायज़ नहीं होगा | अमृता और साहिर की ज़िन्दगी से वाबस्ता सवालों का जवाब उनके माजी में ही दफन है |

अमृता एक साफ़, नेक और खुले दिल की मूरत थी | बगावत और नज़ाक़त उन्हें विरसे में मिले थे | इन्होने १०० से ज्यादा किताबें ज़िन्दगी रहते मुस्संनिफ कीं, जिनमें इनके २५ बरस के नाकामयाब ब्याह और १९४७ के तक़सीम का सदमा ज़ाहिर तौर पे देखने को मिलता है | इनका शुमार मुक्क़द्दम तरक्की-पसंद शायरों में किया जाता है |

अमृता की पैदाइश ३१ अगस्त १९१९ को गुजरावालां में हुयी | इनके वालिद साधू नन्द, साहूकारों के खानदान से थे और चार बेटों और एक बहन में से सबसे छोटे थे | वालिदः की बचपन में ही मौत हो जाने के बाद इनकी परवरिश नानी के यहाँ हुयी | नन्द अपनी बहन 'हाको' से बेहद मोहब्बत करता था | हाको निहायती खुबसूरत थी, जिसके चलते उसने अपने तकरीबन बदसूरत शौहर के घर जाने से इनकार कर दिया | अलाहिदगी इख्तेयार करने के बाद उसने बैराग ले लिया और भगवे कपड़े पहन लिए | हाको का इन्तेकाल जल्द ही हो गया और नन्द का आखिरी हिमायती और सबसे अज़ीज़ रिश्ता ज़र्रों की नज़र हो गया | नन्द अपनी तमाम दौलत और जाएदाद को छोड़ संत दयाल सिंह के डेरे में जाकर रहने लगा | इसी बीच ये नाशिनास फितरत और दिमाग-फिरोज़ बंदा मुख्तलिफ ज़ुबानों में माहिर होकर 'बालका साधू' कहलाया जाने लगा | नन्द के मामा-मामी ने कुछ बरस पहले इनका ब्याह अमृतसर में तय कर दिया था, जिस से किनारा करते हुए नन्द ने रस्मन बैराग ले लिया और खुदा की बंदगी में कलाम लिखने लगा |

मुस्तकबिल में अमृता की हस्ती कितनी इंकेलाबी और गैर-मामूली होने वाली थी, इसकी बुनियाद उनकी गुज़िश्तः ज़िन्दगी में रक्खी जा रही थी | हर किसी का आज, उसके माज़ी की परछाई होता है, जो तमाम ज़िन्दगी साथ-२ चलता है और मुख्तलिफ रंगों में नुमायाँ होता रहता है |

अमृता की माँ राज बीबी गुजरात के छोटे से गाँव 'माँगा' की रहने वाली थी और उसका ब्याह अदला-बदली में एक फौजी के साथ हुआ था, जो एक बार ड्यूटी पे गया तो कभी वापिस ही नहीं आया | राज बीबी अपनी बेवा भाभी के साथ गुजरावालां के छोटे से गाँव में स्कूल में पढाती थी | कभी-२ स्कूल से पहले दयाल सिंह जी के डेरे में माथा टेकने भी जाती थी | एक रोज़ की बात है, जब वो माथा टेकने के लिए डेरे गयी तो बहुत जोर से बारिश होने लगी | इतने सैलाब में डेरे से बहार जाना बेहद मुश्किल था, ऐसे में वक़्त गुजारने के लिहाज़ से दयाल सिंह जी नें "बालका साधू" को कविता सुनाने के लिए कहा | दयाल सिंह हमेशा आँखें बंद करके कविता सुनते थे, उस दिन जब कविता में भक्ति रस की जगह कुछ और सुनाई देने लगा तो यकलख्त आंखें खोली और देखा के नन्द की आंखें राज बीवी के चेहरे की खुबसुरती को निहार रही थी | नन्द की इस आशुफ़्तगी ने दयाल सिंह जी को राज बीबी से ज़ाती तौर पे मज़ाकरा करने के लिए मजबूर कर दिया | राज बीबी से तफ़्सीलि मालुमात हासिल करने के बाद दयाल सिंह जी नें नन्द को राज बीबी के साथ ब्याह करने की नसीहत दी और कहा के बैराग नन्द के लिए नहीं है |

तारीख़ को नन्द का बैराग और राज बीबी का बेवापन मंज़ूर नहीं था | इनकी तक़दीर के सितारों ने अभी इस जहाँ को एक बेशकीमती तोहफा देना था |

शादी-शुदा ज़िन्दगी की बुनियाद रखते ही नन्द नें अपना नाम करतार सिंह हितकारी रख लिया | फिर ३१ अगस्त १९१९ का वो मुक़्क़दस दिन आया जब गुजरावालां में नन्ही अमृता ने जन्म लिया | अमृता का बचपन बहुत मामूली और सादगी भरा था | जब वो ११ बरस की थी तो उसकी माँ बहुत बीमार हो गई | अमृता का खुदा पे अटूट यकीन था, वो बचपन से ही बक़ाएदगी से तफ़क्कुर में खासा वक़्त लगाती थी | इसी के चलते, ये नन्ही सी बच्ची अपनी माँ की सलामती की दुआ करती रही और खुद को इस कदर यकीन दिलाये बैठी थी, मानो खुदा पर उसका कोई ज़ोर हो | खैर, अल्लाह की मर्ज़ी के आगे अमृता की ज़िद एक न चली और उसकी माँ इस जहाँ से गुज़र गयी | इस हादसे के बाद, अमृता का रब से रिश्ता टूट गया और वो अपने पिता की नाफ़रमानी करते हुए कहने लगी,

अमृता: "खुदा नहीं है, कहीं नहीं है"
पिता: "ऐसा नहीं कहते, वो नाराज़ हो जाता है"
अमृता: "तो हो जाए, में जानती हूँ, खुदा कोई नहीं है, ग़र होता तो मेरी ज़रूर सुनता"
पिता: "तू कैसे जानती है, वो दिखाई थोड़े ही देता है?"
अमृता: "पर उसे सुनाई भी नहीं देता"

बहरहाल, अमृता अब मुन्नकिर हो चुकी थी और ज़बरन आंखें बंद करके पिता की ख़ुशी के लिए ध्यान में बैठ जाती थी | ऐसे में वो एक शख्स का तसव्वुर करती, उसे अपना बहुत गहरा दोस्त फ़र्ज़ करती, क्योंकि वो इसकी ख़ूबसूरत तस्वीर बनता था, इसके लिए नगमे लिखता था और गा कर सुनाता था | बेशक इस शख्स का हकीकत से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन अमृता को एक मनचाहा साथी मिल गया था जिसके साथ वो बेफिक्री में रह कर, नामुराद ज़माने से दूर एक जहाँ बसा सकती थी | शायद ये शबाब के आने के दिन थे, अन्दर और बहार की दुनिया के बीच की कशमकश के दिन थे | ये वहम, वक़्त की सियाही से अमृता के ज़हन में एक अक्स बना चूका था, जिस की चाहत और तलाश में अमृता मुस्तकबिल में ठोकरें खाने वाली थी |

1 comment:

Qaseem Abbasi said...

बहुत शुक्रिया! बड़ा दिलचस्प लिखा आपने.
http://life-amusicalfilm.blogspot.com/2010/10/har-ik-pal-ka-shayar-sahir.html