हाशियों के दरमियान कब तक ये रिश्ता रहे
इस रस्सा-कशी के खेल में कब तक यूं पिसता रहे
महीन मगर संगीन इस हाशिये का हश्र महज़ जीत या हार कियों है
हस्ती-ऐ-फानी पे ये गरूर कैसा, अनानियत पे इसरार कियों है
*हस्ती-ऐ-फानी - mortal लाइफ, *अनानियत-एगोइस्म, * इसरार - Obstinacy
मोहब्बत कब तलक यूं जिन्दान की आड़ से तकती रहे
नफरतों के साए में, रश्क-ओ-रकाबत में मुब्तिला रहे
*रश्क-ओ-रकाबत- jealousy, *मुब्तिला - embroiled in
क्या इंसान रह पाना, इतना दुशवार हो चला है
रिश्तों की तह पाना, तल्खी-ऐ-ज़ीस्त हो चला है
------Chander "Maun"
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